खबरों में क्यों हैं ?
- वर्तमान राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने शपथ भाषण के दौरान चार प्रमुख आदिवासी विद्रोह का जिक्र किया है ।
भारत में आदिवासी विद्रोह का इतिहास–
- भारत एक जनजाति प्रधान देश है ।
- भारत में 700 से अधिक जनजाति रहती है ।
- सभी की एक विशेष संस्कृति है।
- सभी के अलग-अलग विकास स्तर है।
- कुछ में विकास ज्यादा हुआ है और कुछ में कम हुआ है।
- सभी आदिवासियों में अपनी संस्कृति और रीति-रिवाज के लिए काफी सम्मान है और उसकी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
- जब भारत ब्रिटिश उपनिवेशवाद का उदय हुआ तो आदिवासियों और उनकी संस्कृत के बीच समीकरण में बदलाव आया ।
- इसी बदलाव के कारण आजादी से पहले 70 से अधिक आदिवासी विद्रोह हुए ।
विद्रोह दो तरह के थे–
- उत्पीड़को के खिलाफ विद्रोह– यह प्रत्यक्षतः ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नहीं था।
- यह ब्रिटिश उपनिवेशवाद से पैदा हुए वर्ग और संस्थानों के खिलाफ था।
- यह वर्ग थे– जमीदार ,साहूकार ,व्यापारी ,ठेकेदार और सरकारी अधिकारी ।
- प्रत्यक्ष तौर पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह– यह प्रत्यक्ष तौर पर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे ।
आदिवासी विद्रोह के कारण
भूमि प्रणाली में बदलाव –
- ब्रिटिश के आने से पूर्व आदिवासी भूमि प्रणाली साझा स्वामित्व पर आधारित थी ।
- जमीदारों और साहूकारों का स्थान नहीं था ।
- ब्रिटिश के आने के बाद भूमि प्रणाली में बदलाव किया गया ।
- जमीदार वर्ग को पेश किया गया ।
- आदिवासियों की भूमिका मात्र काश्तकारों तक ही सीमित रह गई ।
- भूमि का स्वामित्व जमीदारों के पास चला गया ।
- ठेकेदारी प्रणाली की भी शुरुआत की गई ।
- दोनों वर्गों ने मिलकर आदिवासियों को उत्पीड़ित किया ।
- इसी समय पूरे भारत में एक नए बाजार का उदय हुआ ।
- इससे आदिवासी क्षेत्रों पर काफी प्रभाव पड़ा ।
- एक व्यापारिक वर्ग का भी उदय हुआ ।
- बाजार की शुरुआत से साहूकार वर्ग का भी उदय हुआ ।
- इन वर्गों को ब्रिटिश सरकार का समर्थन भी प्राप्त था।
- आदिवासी इन वर्गों के जाल में फंसते चले गए ।
- जिससे इन वर्गों का वर्गों ने उनका उत्पीड़न भी किया।
ब्रिटिश सरकार की वन नीति–
- 19वीं शताब्दी के मध्य तक वनों पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकार थे ।
- 1884 की वन नीति के बाद उनके अधिकारों को सीमित कर दिया गया ।
- इसी समय रेलवे का विकास जोरों पर था ।
- रेलवे लाइन बिछाने के लिए लकड़ियों की जरूरत थी।
- यह लकड़िया वनों से लाई गई।
- वनों पर आदिवासियों का अधिकार था ।
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इसाई मिशनरियों का आगमन–
- जैसे-जैसे भारत में उपनिवेशवाद का उदय हुआ वैसे ही इसाई मिशनरी धर्म प्रचार के लिए भारत आने लगे ।
- मिशनरियों ने आदिवासियों की परंपराओं और रीति– रिवाजों में हस्तक्षेप किया।
- इस वजह से आदिवासी इसाई मिशनरियों को ब्रिटिश के प्रतिनिधि के रूप में और बाहरी लोगों के रूप में देखने लगे ।
आदिवासी विद्रोह की प्रमुख विशेषताएं
- विद्रोह के दौरान ‘जातीय पहचान’ पीछे छूट गई ।
- सामूहिक एकत्रता अधिक महत्वपूर्ण होने लगी ।
- सभी बाहरी लोगों का विरोध नहीं किया गया ।
- गरीब और मजदूर लोग सुरक्षित हैं ।
- उनके साथ कोई हिंसा नहीं की गई ।
- हिंसा और विरोध केवल व्यापारियों और साहूकारों का किया जो ब्रिटिश सरकार का हिस्सा थे ।
विदेशी सरकार के खिलाफ विद्रोह –
- कानून के माध्यम से अधिक आदिवासियों के पारंपरिक सामाजिक आर्थिक फ्रेमवर्क को हानि पहुंचाई गई ।
- जिसके कारण वे सरकार का विरोध करने लगे ।
तकनीकी रूप से पिछड़ा –
- आदिवासी लोग अपने पारंपरिक हथियारों के साथ आधुनिक हथियार वाली ब्रिटिश सरकार के खिलाफ थे।
- यह पूरा युद्ध काफी मुश्किल था ।
प्रमुख आदिवासी विद्रोह
संथाल विद्रोह
- जून 1855 में 10,000 से अधिक संथाल जनजाति के लोगों ने विद्रोह किया ।
- विद्रोह के प्रमुख नेता –कान्हो मुर्मू, चांद मुर्मू ,भैरव मुर्मू और सिद्धो मुर्मू थे ।
- यह बाहरी लोगों (दिकू) के खिलाफ विद्रोह था ।
- राजस्व अधिकारी ,जमीदार ,साहूकार और ईस्ट इंडिया कंपनी के समर्थक यह सभी बाहरी लोग थे ।
- यह विद्रोह वर्तमान झारखंड के भोगनाडीह गांव में हुआ था ।
विद्रोह का कारण
- पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजमहल पहाड़ियों के वन क्षेत्र में संथाल लोगों को यहां बसाना शुरू किया।
- 1832 में इस क्षेत्र को ‘दामिन– ए –कोह’ घोषित किया गया समय के साथ संस्था लोगों के साथ उत्पीड़न किया गया ।
- कर लगाया जाने लगा ।
- उनकी जमीनों पर कब्जा किया जाने लगा ।
- इसी कारण 1855 में हजारों संथालों ने विद्रोह कर दिया।
पाइका विद्रोह (1817)
- यह विद्रोह ओडिशा के खुर्दा में हुआ था ।
- इसे स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम युद्ध के नाम से भी जाना जाता है ।
- पाईका– यह एक सैनिक वर्ग था ।
- 16 वीं शताब्दी में ओडिशा के राजाओं द्वारा इन्हें कर- मुक्त भूमि और उपाधियां दी जाती थी ।
- बदले में वे लोग सैन्य सेवाएं देते थे ।
- 1803 में ब्रिटिश ने ओडिशा के राजा को सत्ता से बेदखल कर दिया और नई भूमि राजस्व प्रणाली लागू की ।
- इसी तरह पाईका लोगों को उनकी भूमि से बेदखल कर दिया गया और उपाधियां भी छीन ली गई ।
- इसी समय कोंध समुदाय द्वारा भी विद्रोह चल रहा था।
- 400 कोंध लोगों ने ब्रिटिश सरकार का विरोध किया।
- कोंध विद्रोह से ही पाइका विद्रोह का जन्म हुआ।
- इस विद्रोह का नेतृत्व बक्सी जगबंधु विद्याधर महापात्र राय ने किया ।
- ये ओडिशा के शासक के जर्नल थे ।
- अंततः 1825 में उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया ।
कोल विद्रोह (1831)
- छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासी समूह( कोल) ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह किया ।
- आदिवासी लोगों की भूमि पर गैर –आदिवासी बाहरी लोगों द्वारा अधिग्रहण किया जा रहा था ।
- भूमि पर कब्जा और आर्थिक शोषण के कारण हथियार उठाने पड़े ।
- इस विद्रोह का नेतृत्व बुद्ध भगत ,जोसा भगत, और मदारा महतो ने किया ।
- बाद में होश, मुंडा और उरांव जनजाति भी इसमें शामिल हो गए थे ।
- यह विद्रोह 2 वर्ष तक चला ।
- यह विद्रोह रांची ,हजारीबाग, पलामू ,मानभूमि जैसे क्षेत्रों में फैला था ।
भील विद्रोह
- भील जाति के लोग पश्चिमी तट पर स्थित खानदेश में निवास करते थे ।
- ब्रिटिश सरकार के आगमन से भी लोगों के बीच उत्पीड़न का डर और परंपराओं के नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया ।
- यही विद्रोह का कारण बना ।
- यह विद्रोह तीन चरणों में हुआ 1818 ,1825 और 1831-46 के बीच।