पंचायती राज
- 1882 में लॉर्ड रिपन ने स्थानीय स्वशासन संबंधी प्रस्ताव दिया, जिसे भारतीय स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के इतिहास में ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है। इस प्रस्ताव के तहत रिपन ने नगरीय स्थानीय संस्थाओं के साथ-साथ ग्राम पंचायतों, न्याय पंचायतों तथा जिला स्तर पर जिला बोर्ड के गठन का प्रस्ताव रखा था।
संविधान लागू होने के बाद की विकास यात्रा
- 2 अक्तूबर, 1952 को देश के 55 विकास खंडों में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गई।
- इस कार्यक्रम के मूल्यांकन के लिये बलवंत राय मेहता समिति बनाई गई। बलवंत राय मेहता को ही भारत के पंचायती राज व्यवस्था का वास्तुकार (शिल्पी) कहा जाता है।
- इस समिति ने सामुदायिक विकास कार्यक्रमों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाने का मूल कारण जन-सहभागिता की उपेक्षा को माना व सुझाव दिया कि जन-सहभागिता सुनिश्चित करने का सबसे ठोस तरीका पंचायती राज ही हो सकता है, अतः पंचायतों का त्रिस्तरीय ढाँचा बनाया जाना चाहिये।
- सबसे पहले राजस्थान विधानसभा ने स्थानीय स्वशासन संबंधित अधिनियम पारित किया, जिसके आधार पर 2 अक्तूबर, 1959 को नागौर में नेहरू जी ने देश की पहली त्रिस्तरीय पंचायत का उद्घाटन किया।
- इसके तुरंत बाद 11 अक्तूबर, 1959 को ऐसी ही व्यवस्था आंध्र प्रदेश के महबूबनगर जिले के शादनगर विकास खंड में शुरू की गई।
पंचायती राज पर गठित समितियाँ
- इन समितियों की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री राजीव गांधी, 1989 के लोकसभा चुनाव के पहले पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने वाला 64वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित करना चाहते थे लेकिन वह राज्यसभा में अपेक्षित बहुमत हासिल नहीं कर पाए। आगे यही विधेयक 73वें संविधान संशोधन का आधार बना।
समिति | सिफारिश |
बलवंत राय मेहता (1957) | त्रिस्तरीय पंचायत के गठन का सुझाव |
अशोक मेहता (1977) | त्रिस्तरीय की जगह द्विस्तरीय पंचायत के गठन का सुझाव |
जी.वी.के. राव (1985) | जिला स्तरीय निकाय को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में महत्त्वपूर्ण स्थान देने का सुझाव |
लक्ष्मीमल सिंघवी (1986) | पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने का सुझाव |
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73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
- 24 अप्रैल, 1993 को 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पूरे देश में लागू हुआ, इसलिये इस तिथि को ‘राष्ट्रीय पंचायत दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है। इस संशोधन के माध्यम से पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
- इसके तहत संविधान के भाग-9 को पुनः जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत मूल संविधान में एकमात्र अनुच्छेद-243 था।
- भाग-9 का शीर्षक है- ‘पंचायतें’ तथा इसमें अनुच्छेद 243 से 243ण (O) तक हैं।
- इसके अलावा इस संशोधन के माध्यम से संविधान में 11 वीं अनुसूची भी जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों के लिये निर्दिष्ट 29 विषयों की सूची दी गई है।
पंचायती राज (Panchayati Raj) राज्य सूची का विषय है।
पंचायतों का गठन, अनुच्छेद-243B
- प्रत्येक राज्य ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायत का गठन करेगा।
- मध्यवर्ती पंचायत का गठन उन राज्यों में किया जाएगा, जिनकी जनसंख्या 20 लाख या उससे अधिक हो।
पंचायतों की संरचना, अनुच्छेद-243C
- राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा पंचायतों की संरचना के संदर्भ में उपबंध कर सकता है।
स्थानों का आरक्षण, अनुच्छेद-243D
- अनुच्छेद 243D में पंचायतों में आरक्षण संबंधित प्रावधान दिये गए हैं
- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व महिलाओं को आरक्षण देना अनिवार्य है।
- पिछड़े वर्गों के आरक्षण का फैसला राज्य विधानमंडल के स्वविवेक पर है।
- महिलाओं के लिये प्रत्येक पंचायत क्षेत्र में कम-से-कम 1/3 स्थान आरक्षित हैं।
- राज्य विधानमंडल चाहे तो इस संख्या को बढ़ा सकती है, लेकिन कम नहीं कर सकती।
- अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के लिये प्रत्येक पंचायत क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित किये जाएंगे।
- [उपर्युक्त तरह आरक्षणों में स्थान चक्रानुक्रम (Rotation) पद्धति से आवंटित किये जाएंगे]
- अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिये आरक्षित स्थानों में से कम-से-कम 1/3 स्थान उसी वर्ग की महिलाओं के लिये आरक्षित होंगे।
- आरक्षण देने की उपर्युक्त व्यवस्था ग्राम तथा अन्य स्तर के लिये भी की जाएगी।
- पदों में आरक्षण के संदर्भ में राज्य की कुल जनसंख्या को आधार बनाया जाएगा, जो कि स्थानों के आरक्षण के संदर्भ में पंचायत स्तर की कुल जनसंख्या के आधार से अलग है
अवधि, अनुच्छेद-243E
- प्रत्येक पंचायत, यदि किसी विधि के अधीन कार्यकाल से पूर्व विघटित नहीं की जाती है तो अपने प्रथम अधिवेशन के लिये नियत तारीख से पाँच वर्ष तक बनी रहेगी। विघटन की स्थिति में 6 माह के भीतर पुनः चुनाव करा लिया जाएगा।
राज्य वित्त आयोग, अनुच्छेद-2431
- प्रत्येक राज्य का राज्यपाल प्रति 5 वर्ष पर राज्य वित्त आयोग का गठन करेगा, जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है।
- इसके द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट को राज्यपाल, राज्य विधानमंडल में रखवाता है।
- राज्य निर्वाचन आयोग, अनुच्छेद- 243K पंचायतों के लिये कराए जाने वाले सभी निर्वाचनों का संचालन और अधीक्षण राज्य निर्वाचन आयोग करेगा। इसमें एक राज्य निर्वाचन आयुक्त (राज्यपाल द्वारा नियुक्त) होगा।
- राज्य निर्वाचन आयुक्त को उन्हीं रीति और आधार पर हटाया जा सकता है, जैसा कि उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है।